Citizen ship acts नागरिकता संशोधन अधिनियम

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नागरिकता संशोधन अधिनियम

Citizen ship acts

Citizen ship acts नागरिकता संशोधन अधिनियम नागरिकता अधिनियम 1955
नागरिकता अधिनियम 1955 हमें अधिग्रहण और नागरिकता के लोग होने के बारे में बताता है यह अधिनियम भविष्य में भी दो में भी दो भविष्य में भी दो में भी दो बार संशोधित हो चुका है इस अधिनियम का पहला संशोधन 1986 में हुआ था नागरिकता संशोधन अधिनियम 1986 और दूसरा संशोधन 1992 में हुआ जो नागरिकता संशोधन अधिनियम 1992 है

नागरिकता संशोधन अधिनियम 1986

Citizen ship acts नागरिकता संशोधन अधिनियम
इस अधिनियम के माध्यम से बताया गया है कि यदि कोई व्यक्ति जो भारत में जन्मा है भारतीय नागरिक के रूप में पंजीकृत होना चाहता है तो उसे 5 वर्षों तक लगातार भारत में रहने का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा जबकि संशोधन से पहले इस अधिनियम में यह अवधि 6 माह थी थी माह थी थी 6 माह थी थी थी परंतु 1986 के संशोधन अधिनियम में 6 माह से बढ़ाकर 5 वर्ष कर दी गई इसके अलावा इस अधिनियम से यह भी साफ हुआ कि कोई भी ऐसा बच्चा या व्यक्ति जो भारत में जन्म लेता है उसको स्वयं ही नागरिकता नहीं मिल जाएगी जन्म के आधार पर ऐसे लोगों को ही नागरिकता दी जाएगी जिनके माता-पिता में से कोई एक पहले से भारत का नागरिक वाधवा माता और पिता दोनों ही भारत के नागरिक हो परंतु संशोधन से पहले भारत में जन्म लेने वाले किसी भी बच्चे को स्वयं भारतीय नागरिकता मिल जाती थी पर इस प्रकार भारत का नागरिक बन जाता था जो की जन्म के आधार पर नागरिकता होती है साथ ही साथ प्रवासी के रूप में रहने वाले विदेशी लोगों के लिए देशीय करण के आधार पर नागरिकता की शर्त जो कि पूर्व में 5 वर्ष थी इस 5 वर्ष की अवधि को बढ़ाकर 10 वर्ष 10 वर्ष किया गया इसके अलावा भारतीय पुरुष से विवाह करने वाली महिला से विवाह करने वाली महिला करने वाली महिला को भारत की नागरिकता को ग्रहण करने का अधिकार दिया गया चाहे वह महिला किसी भी देश से हो भारत की नागरिकता ग्रहण कर सकती है

नागरिकता संशोधन अधिनियम 1992

Citizen ship acts नागरिकता संशोधन अधिनियम
नागरिकता संशोधन अधिनियम 1992 के अनुसार ऐसे लोगों को अथवा बच्चों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान किया गया जिनका जन्म भारत से बाहर हुआ है परंतु उनके माता अथवा पिता में से कोई एक भारतीय है संशोधन से पहले सिर्फ पिता के भारतीय होने पर होने पर नागरिकता मिलने का प्रावधान था परंतु संशोधित करके इस अधिनियम में माता का नाम भी जोड़ा गया और महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष रखने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया जो सराहनीय है

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